'भारत माता' अध्याय पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखित 'हिंदुस्तान की कहानी' का पाँचवाँ अध्याय है। इसमें नेहरू जी ने बताया है कि कैसे वे देश के विभिन्न कोनों में जाकर किसानों को 'भारत माता' के वास्तविक अर्थ से परिचित कराते थे। यह पाठ देश की एकता और अखंडता का एक सुंदर संदेश देता है।
नेहरू जी जब देश के अलग-अलग हिस्सों में सभाएँ करने जाते थे, तो वे अक्सर किसानों से 'भारत' या 'हिंदुस्तान' की चर्चा करते थे। वे उन्हें बताते थे कि कैसे पूरा देश एक है, भले ही यहाँ की भाषाएँ और रीति-रिवाज अलग-अलग हों। वे किसानों को यह समझाने की कोशिश करते थे कि उनकी समस्याएँ (गरीबी, कर्ज, लगान) पूरे देश के किसानों के लिए एक जैसी हैं और इसका समाधान भी 'स्वराज' में ही है।
जब सभाओं में लोग 'भारत माता की जय' का नारा लगाते थे, तो नेहरू जी उनसे पूछते थे कि इस नारे में 'भारत माता' कौन है? लोग अक्सर चुप हो जाते या केवल धरती को माता मानते। तब नेहरू जी उन्हें विस्तार से समझाते कि इस देश के पहाड़, नदियाँ, जंगल और खेत तो भारत माता हैं ही, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यहाँ की जनता है। जब हम 'भारत माता की जय' कहते हैं, तो असल में हम भारत के करोड़ों लोगों की जय कहते हैं।
नेहरू जी केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहते थे। वे अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे किसानों को दुनिया की अन्य घटनाओं (जैसे चीन, स्पेन, अमेरिका और सोवियत संघ के बदलावों) के बारे में भी बताते थे। वे चाहते थे कि भारतीय किसान अपनी सोच का दायरा बढ़ाएं और खुद को दुनिया का एक हिस्सा समझें। वे बताते थे कि कैसे पश्चिमी देशों में तकनीक और विज्ञान के माध्यम से बदलाव आ रहे हैं।
नेहरू जी को यह देखकर हैरानी और खुशी होती थी कि किसान उनके इस दर्शन को धीरे-धीरे समझने लगे थे। जब किसानों को यह अहसास होता कि वे खुद ही भारत माता के हिस्से हैं, तो उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ जाती थी। उन्हें अपनी महत्ता का बोध होता था और यही इस पाठ का मुख्य उद्देश्य है।