पाठ 4: बिदाई-संभाषण (बालमुकुंद गुप्त)

'बिदाई-संभाषण' शिवशंभु के चिट्ठे का एक अंश है। इसमें लेखक बालमुकुंद गुप्त ने वाइसराय लॉर्ड कर्जन के शासनकाल के अंत और उनकी बिदाई पर गहरा व्यंग्य किया है। यह पाठ भारतीयों की विवशता और कर्जन की निरंकुशता को उजागर करता है।

1. बिदाई का समय और करुणा

लेखक कहते हैं कि बिदाई का समय हमेशा करुणाजनक होता है। भारत जैसे देश में, जहाँ पशु-पक्षी भी बिछड़ते समय उदास हो जाते हैं (जैसे शिवशंभु की दो गायों का उदाहरण), वहाँ एक वाइसराय की बिदाई कितनी भावुक होनी चाहिए थी। लेकिन लॉर्ड कर्जन के मामले में स्थिति अलग है क्योंकि उनके शासन ने जनता को केवल दुख ही दिया है।

"लॉर्ड कर्जन ने भारत पर दो बार शासन किया, लेकिन उनका अंत इतना अपमानजनक होगा, इसकी कल्पना उन्होंने खुद भी नहीं की थी।"

2. लॉर्ड कर्जन की निरंकुशता

कर्जन का शासन काल 'अति' (excess) का काल था। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता छीन ली, शिक्षा व्यवस्था को सरकारी नियंत्रण में कर दिया और बंगाल का विभाजन (Partition of Bengal) करके भारतीयों की भावनाओं को गहरी चोट पहुँचाई। लेखक व्यंग्य करते हैं कि कर्जन खुद को खुदा से कम नहीं समझते थे, लेकिन अंत में एक छोटे से पद के लिए इस्तीफा देने पर उन्हें मजबूर होना पड़ा।

3. भारतीयों की सहनशीलता और ब्रिटिश शासन

लेखक बताते हैं कि भारतीय जनता बहुत सहनशील है। उन्होंने कर्जन के हर अत्याचार को सहा। कर्जन ने कभी भी प्रजा के सुख-दुख की चिंता नहीं की। वे केवल अपनी जिद और अहंकार में डूबे रहे। लेखक ने नादिरशाह जैसे क्रूर शासक से भी कर्जन की तुलना की है, जिसने कम से कम प्रार्थना करने पर कत्लेआम रोक दिया था, लेकिन कर्जन ने भारतीयों की प्रार्थना कभी नहीं सुनी।

4. अंत और बिदाई की विडंबना

अंत में लेखक कहते हैं कि काश लॉर्ड कर्जन जाते-जाते भारतीयों से माफ़ी मांगते या उनके प्रति सहानुभूति दिखाते। लेकिन उनका अहंकार अंत तक बना रहा। यह बिदाई भारतीयों के लिए खुशी की बात है क्योंकि उन्हें एक अत्याचारी शासन से मुक्ति मिल रही है, लेकिन एक मनुष्य के नाते लेखक उनके पतन पर व्यंग्यात्मक दुख भी प्रकट करते हैं।

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