'गलता लोहा' शेखर जोशी की एक सशक्त कहानी है। यह समाज के जातिगत गौरव के ढहने और मेहनत के सम्मान को दर्शाती है। कहानी मुख्य रूप से दो मित्रों, मोहन और धनराम के माध्यम से ब्राह्मण और लोहार वर्ग के बीच की सामाजिक दूरी और अंततः उसके मिटने की प्रक्रिया को दिखाती है।
मोहन एक मेधावी छात्र था, जो एक पुरोहित परिवार से था। उसके पिता वंशीधर चाहते थे कि वह पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने। स्कूल में मास्टर त्रिलोक सिंह उसे अपनी "अपेक्षाओं का केंद्र" मानते थे। मोहन न केवल पढ़ाई में तेज था, बल्कि गायन में भी निपुण था, जिसके कारण वह मास्टर जी का प्रिय शिष्य था।
धनराम लोहार जाति का था और मोहन का सहपाठी था। मास्टर जी अक्सर उसे उसकी मंदबुद्धि और जाति को लेकर ताने देते थे। धनराम ने बचपन से ही यह स्वीकार कर लिया था कि वह उच्च जाति के मोहन की बराबरी नहीं कर सकता। वह अपने पिता के साथ भट्टी पर काम सीखता था और मोहन के प्रति मन में एक सहज सम्मान रखता था।
पढ़ाई के लिए मोहन को लखनऊ भेजा गया, लेकिन वहाँ वह एक नौकर की तरह बनकर रह गया। रमेश (उसके रिश्तेदार) ने उसे स्कूल भेजने के बजाय घर के कामों में लगा दिया। जिस मोहन को गाँव में "बड़ा आदमी" बनने का आशीर्वाद मिला था, वह शहर की भीड़ और शोषण में खो गया। अंततः वह वापस गाँव लौट आया और खेती-बाड़ी में लग गया।
कहानी का क्लाइमेक्स तब आता है जब मोहन अपना हँसुआ (Sickle) तेज करवाने धनराम की दुकान पर जाता है। वहाँ मोहन न केवल काम देखता है, बल्कि खुद भी लोहे की छड़ को मोड़ने में धनराम की मदद करता है। एक ब्राह्मण पुत्र का लोहार की भट्टी पर बैठकर काम करना समाज के पुराने नियमों को तोड़ता है। मोहन की आँखों में एक 'सृजन की चमक' थी, जिसमें जाति का कोई अहंकार नहीं था।