प्रस्तुतकर्ता: सोलंकी सर डिजिटल एकेडमी
प्रसंग: इस पद में मीराबाई ने श्री कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति और समर्पण भाव को व्यक्त किया है।
विस्तृत व्याख्या: मीरा कहती हैं कि मेरे तो एकमात्र गिरधर गोपाल (कृष्ण) ही सब कुछ हैं, उनके अलावा मेरा इस संसार में कोई दूसरा नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि जिसके सिर पर मोर मुकुट है, वही मेरा पति है। कृष्ण की भक्ति के लिए उन्होंने अपने परिवार की मर्यादा (कुल की कानि) को भी त्याग दिया है। वे संतों के साथ बैठकर ज्ञान प्राप्त करती हैं, भले ही दुनिया इसे 'लोक-लाज' खोना कहे।
काव्य-सौंदर्य: यहाँ 'बैठि-बैठि' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। भाषा सरल और संगीतमय राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है।
प्रसंग: इस पद में मीरा पर हुए अत्याचारों और उनकी अडिग भक्ति का वर्णन है।
विस्तृत व्याख्या: मीरा कृष्ण की भक्ति में इतनी लीन हैं कि वे पैरों में घुँघरू बाँधकर नाचने लगी हैं। वे कहती हैं कि मैं अपने नारायण (कृष्ण) के सामने पूरी तरह सच्ची और समर्पित हूँ। समाज उन्हें पागल कहता है और रिश्तेदार (न्यात) उन्हें कुल का नाश करने वाली बताते हैं। जब राणा ने उन्हें मारने के लिए जहर (विख) का प्याला भेजा, तो मीरा उसे हँसते-हँसते पी गईं, क्योंकि उन्हें अपने प्रभु पर पूरा भरोसा था।
काव्य-सौंदर्य: भक्ति रस की प्रधानता है। 'कुलनासी' शब्द समाज की संकीर्ण सोच पर व्यंग्य करता है।
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