पाठ 2: मियाँ नसीरुद्दीन (कृष्णा सोबती)
'मियाँ नसीरुद्दीन' लेखिका कृष्णा सोबती द्वारा रचित एक संस्मरण है, जो उनके प्रसिद्ध संग्रह 'हम हशमत' से लिया गया है। इसमें लेखिका ने खानदानी नानबाई मियाँ नसीरुद्दीन के व्यक्तित्व, उनकी कला और उनके आत्मविश्वास का बहुत ही सजीव चित्रण किया है।
1. मियाँ नसीरुद्दीन का व्यक्तित्व
मियाँ नसीरुद्दीन दिल्ली के मटियामहल के गढ़ैया मोहल्ले में एक छोटी सी अंधेरी दुकान पर बैठते हैं। वे छप्पन (56) तरह की रोटियाँ बनाने के लिए मशहूर हैं। जब लेखिका उनसे मिलने पहुँचती हैं, तो वे मियाँ को चारपाई पर बैठे बीड़ी का मज़ा लेते हुए पाती हैं। उनके चेहरे पर एक मँझे हुए कलाकार की चमक और आँखों में काइयाँपन (चालाकी) दिखाई देता है।
"मियाँ नसीरुद्दीन केवल रोटी बनाने वाले नहीं, बल्कि रोटी बनाने की कला के 'मसीहा' माने जाते हैं।"2. खानदानी हुनर और परंपरा
मियाँ नसीरुद्दीन अपने काम को एक मामूली धंधा नहीं, बल्कि एक 'कला' (Art) मानते हैं। वे गर्व से बताते हैं कि यह उनका खानदानी पेशा है। उनके पिता 'बरकत शाही नानबाई' के नाम से मशहूर थे और उनके दादा 'आला नानबाई मियाँ कल्लन' थे। मियाँ का मानना है कि सच्चा हुनर केवल बातें करने से नहीं, बल्कि "काम करने से आता है।" उन्होंने यह कला अपने पिता के साथ भट्टी सुलझाने और बर्तन धोने जैसे छोटे कामों से सीखी थी।
3. बादशाह के वक्त की बातें
बातचीत के दौरान मियाँ नसीरुद्दीन अपनी खानदानी बड़प्पन दिखाने के लिए बादशाह के दौर की कहानियाँ सुनाते हैं। वे दावा करते हैं कि उनके पूर्वज बादशाह के खास नानबाई थे और ऐसी चीजें बना सकते थे जो न आग से पकती थीं और न पानी से। हालाँकि, जब लेखिका बादशाह का नाम पूछती हैं, तो मियाँ थोड़े झेंप जाते हैं क्योंकि उन्हें खुद सटीक नाम याद नहीं होता। वे केवल अपनी परंपरा का गौरव गान करना जानते हैं।
4. रोटी बनाने की विभिन्न किस्में
मियाँ नसीरुद्दीन रोटियों के इतने माहिर हैं कि वे बाकरखानी, शीरमाल, ताफ़तान, खमीरी, रुमाली, गाओदीदा, गाज़बान और तुनकी जैसी रोटियाँ बनाते हैं। वे विशेष रूप से 'तुनकी' रोटी का जिक्र करते हैं जो पापड़ से भी महीन होती है। वे दुख के साथ यह भी कहते हैं कि आज के दौर में कद्रदान (कला को समझने वाले) नहीं रहे, अब तो बस 'खाया और चलते बने' का जमाना है।