मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित 'नमक का दरोगा' कहानी भारतीय साहित्य की एक कालजयी रचना है। यह कहानी उस समय की है जब नमक पर सरकारी पाबंदी लगी थी और नमक विभाग में भ्रष्टाचार चरम पर था। यह 'धन' पर 'धर्म' की जीत का एक जीवंत उदाहरण है।
मुंशी वंशीधर एक मध्यमवर्गीय परिवार के युवक थे। उनके पिता एक अनुभवी व्यक्ति थे लेकिन वे दुनियादारी और रिश्वत को ही जीवन का आधार मानते थे। उन्होंने वंशीधर को नौकरी पर जाते समय सलाह दी कि "ऊपरी आय पर नज़र रखना, क्योंकि वह बहता हुआ स्रोत है।" लेकिन वंशीधर अपनी ईमानदारी और धैर्य के साथ नमक विभाग में दरोगा के पद पर नियुक्त हुए। अपनी कार्यकुशलता से उन्होंने छह महीने के भीतर ही सबका दिल जीत लिया।
"वंशीधर के लिए कर्तव्य सर्वोपरि था, वे अपने पिता की नसीहतों के बजाय अपने विवेक और आदर्शों पर चलते थे।"जाड़े की एक रात जब वंशीधर यमुना तट पर सो रहे थे, तभी उन्हें गाड़ियों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। तट पर जाकर देखा तो नमक की गाड़ियों की तस्करी हो रही थी। ये गाड़ियाँ उस इलाके के सबसे प्रतिष्ठित और धनवान जमींदार पंडित अलोपीदीन की थीं। अलोपीदीन का मानना था कि "संसार ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज है।" उन्होंने वंशीधर को भारी रिश्वत (40 हजार रुपये तक, जो उस समय एक बहुत बड़ी रकम थी) देने की कोशिश की।
वंशीधर ने अलोपीदीन के धन के प्रलोभन को ठुकरा दिया और उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया। यह उस समय की एक बहुत बड़ी घटना थी क्योंकि अलोपीदीन जैसे शक्तिशाली व्यक्ति को कोई छूने का साहस नहीं करता था। वंशीधर ने साफ कहा—"हम उन नमक हरामों में से नहीं हैं जो कौड़ियों पर अपना ईमान बेचते फिरें।"
मामला अदालत पहुँचा। वहाँ चारों ओर अलोपीदीन के धन का प्रभाव था। वकील, गवाह और यहाँ तक कि न्याय के अधिकारी भी अलोपीदीन के पक्ष में झुक गए। वंशीधर के पास केवल 'सत्य' का बल था। अदालत ने अलोपीदीन को ससम्मान बरी कर दिया और वंशीधर को "अनुभवहीन" करार दिया। इसके कुछ ही दिनों बाद वंशीधर को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
नौकरी छूटने के बाद वंशीधर अपने घर लौटे जहाँ उन्हें पिता की कड़वी बातें सुननी पड़ीं। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा मोड़ तब आता है जब पंडित अलोपीदीन स्वयं वंशीधर के घर पहुँचते हैं। वे वंशीधर की बेमिसाल ईमानदारी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वंशीधर के सामने एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने वंशीधर को अपनी पूरी जायदाद का 'स्थायी मैनेजर' नियुक्त किया और उन्हें मान-सम्मान के साथ ऊँचा वेतन भी दिया। अलोपीदीन ने स्वीकार किया कि "मर्यादा और सत्य पर अडिग रहने वाला व्यक्ति ही सबसे बड़ा धन है।"