पाठ 7: रजनी (मन्नू भंडारी)

'रजनी' सुप्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी द्वारा रचित एक पटकथा है। यह समाज में व्याप्त अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाली एक जुझारू महिला 'रजनी' के चरित्र पर आधारित है। यह पाठ विशेष रूप से स्कूलों में शिक्षकों द्वारा जबरन ट्यूशन लेने की समस्या और शिक्षा के व्यवसायीकरण पर तीखा प्रहार करता है।

1. अमित का रिजल्ट और रजनी का हस्तक्षेप

कहानी की शुरुआत अमित के घर से होती है, जो रजनी की सहेली लीला का बेटा है। अमित बहुत होनहार छात्र है, लेकिन उसे गणित में बहुत कम अंक मिलते हैं क्योंकि उसने अपने शिक्षक से ट्यूशन नहीं ली थी। जब रजनी को पता चलता है कि अमित ने सारे सवाल सही किए थे फिर भी उसे नंबर कम दिए गए, तो वह इसे एक गंभीर अन्याय मानती है और इसके खिलाफ लड़ने का फैसला करती है।

"रजनी का मानना है कि अन्याय करने वाले से ज्यादा अन्याय सहने वाला गुनहगार होता है।"

2. हेडमास्टर और शिक्षा विभाग की उदासीनता

रजनी पहले स्कूल के हेडमास्टर से मिलती है, लेकिन वे इसे 'टीचर और स्टूडेंट का आपसी मामला' कहकर टाल देते हैं। इसके बाद वह शिक्षा विभाग के डायरेक्टर से मिलती है। डायरेक्टर भी इसे कोई बड़ा मुद्दा नहीं मानते और कहते हैं कि उनके पास इसके खिलाफ कोई नियम नहीं है। अधिकारियों का यह रवैया रजनी को और ज्यादा क्रोधित कर देता है।

3. जन-आंदोलन और अखबार का सहारा

अकेले लड़ने के बजाय रजनी अब समाज को इकट्ठा करती है। वह अखबार के संपादक से मिलती है और इस समस्या को प्रमुखता से छपवाती है। वह अभिभावकों की एक बड़ी सभा (Meeting) आयोजित करती है, जिसमें ट्यूशन के नाम पर हो रहे शोषण के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया जाता है। रजनी की दृढ़ता देखकर धीरे-धीरे लोग उसके साथ जुड़ने लगते हैं।

4. संघर्ष की जीत

रजनी के निरंतर दबाव और जन-आंदोलन के कारण अंततः शिक्षा विभाग को झुकना पड़ता है। विभाग एक नया नियम बनाता है कि कोई भी शिक्षक अपने ही स्कूल के छात्रों को जबरन ट्यूशन नहीं पढ़ाएगा और स्कूलों में अंकों की धांधली पर कड़ी नजर रखी जाएगी। यह न केवल रजनी की जीत थी, बल्कि पूरे समाज की जीत थी जिसने अन्याय के खिलाफ चुप्पी तोड़ी थी।

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