महाकवि देव रीति काल के प्रमुख कवि हैं। उनके काव्य में श्रृंगार रस और कलात्मकता का बेजोड़ संगम मिलता है। आपके पाठ्यक्रम में संकलित पदों में विरह की व्याकुलता (हँसी की चोट), मधुर मिलन का स्वप्न (सपना) और तत्कालीन दरबारी संस्कृति पर तीखा व्यंग्य (दरबार) देखने को मिलता है।
"देव का काव्य अपनी शब्द-मैत्री और आलंकारिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ भावनाओं को सूक्ष्मता से उकेरा गया है।"
2. पदों का संक्षिप्त भावार्थ
हँसी की चोट: कृष्ण के चले जाने पर गोपी की विरह दशा का वर्णन है। कृष्ण की एक हँसी ने गोपी का हृदय हर लिया, और अब वह उनके वियोग में इतनी क्षीण हो गई है कि उसका शरीर पंचतत्वों से विहीन होता जा रहा है।
सपना: इसमें गोपी कृष्ण के साथ झूला झूलने का स्वप्न देख रही है। जैसे ही मिलन का आनंद चरम पर पहुँचता है, उसकी नींद खुल जाती है और वह विरह की अग्नि में जलने लगती है। 'नींद उचटी' पर कृष्ण का साथ छूट जाना बहुत मार्मिक है।
दरबार: इस सवैया में देव ने अपनी दरबारी सेवा के अनुभवों को पिरोया है। वे कहते हैं कि जहाँ राजा अंधे और दरबारी बहरे हों, वहाँ कला और प्रतिभा का कोई मूल्य नहीं होता।
3. काव्य सौंदर्य
भाषा: मधुर और कोमल ब्रजभाषा।
अलंकार: अनुप्रास, रूपक और उत्प्रेक्षा का प्रचुर प्रयोग।
छंद: कवित्त और सवैया छंदों का प्रयोग।
4. महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1: 'हँसी की चोट' सवैये में गोपी की स्थिति कैसी हो गई है? उत्तर: कृष्ण की मुस्कान के मोहपाश में बँधी गोपी विरह में इतनी दुर्बल हो गई है कि उसके शरीर के तत्व—हवा, अग्नि और जल—समाप्त होते जा रहे हैं। अब वह केवल आकाश तत्व के सहारे कृष्ण के आने की प्रतीक्षा कर रही है।
प्रश्न 2: 'सपना' कवित्त में गोपी की 'जागने' पर क्या दशा होती है? उत्तर: गोपी स्वप्न में कृष्ण के साथ मिलन का सुख पा रही थी, लेकिन जागते ही उसे अहसास होता है कि न बादल हैं, न बारिश और न ही कृष्ण। उसकी आँखों में मिलन की खुशी की जगह वियोग के आँसू आ जाते हैं।
प्रश्न 3: 'दरबार' सवैये के माध्यम से देव ने क्या व्यंग्य किया है? उत्तर: देव ने दरबारी चाटुकारिता और विवेकहीन राजाओं पर चोट की है। वे कहते हैं कि जहाँ गुण ग्राहक (प्रतिभा पहचानने वाले) न हों, वहाँ गुणी व्यक्ति का चुप रहना ही बेहतर है।