'गूँगे' रांगेय राघव की एक अत्यंत मार्मिक और मर्मस्पर्शी कहानी है। यह कहानी एक ऐसे किशोर की है जो बोल और सुन नहीं सकता। समाज उसे दया की दृष्टि से देखने के बजाय उसका तिरस्कार करता है और उसे एक 'वस्तु' की तरह इस्तेमाल करता है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया है कि विकलांगों को दया की नहीं, बल्कि सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता होती है।
"असली गूँगे वे नहीं जो बोल नहीं सकते, बल्कि वे हैं जो दूसरों का दुख देखकर भी चुप रहते हैं।"
2. कहानी का सारांश
कहानी का मुख्य पात्र एक गूँगा लड़का है जिसे उसकी बुआ और फूफा पालते हैं। वे उसे केवल भोजन के बदले दिन-भर काम करवाते हैं और उसे मारते-पीटते हैं। सुशीला, जो पड़ोस में रहती है, पहले तो उसके प्रति सहानुभूति दिखाती है, लेकिन बाद में वह भी समाज की तरह संवेदनहीन हो जाती है। गूँगा लड़का अपनी मूक भाषा में आत्मसम्मान और प्यार ढूंढता है, लेकिन उसे हर जगह अपमान ही मिलता है।
3. कहानी का मूल उद्देश्य
सामाजिक संवेदनशीलता: समाज को विकलांगों के प्रति संवेदनशील बनाना।
आत्मसम्मान का मुद्दा: यह दिखाना कि शारीरिक अक्षमता के बावजूद व्यक्ति के भीतर आत्मसम्मान की भावना प्रबल होती है।
दोहरा चरित्र: समाज के उन लोगों पर प्रहार करना जो ऊपर से दयालु होने का ढोंग करते हैं लेकिन भीतर से निष्ठुर होते हैं।
4. महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (High Value Q&A)
प्रश्न 1: गूँगा लड़का अपनी बात दूसरों को कैसे समझाता था? उत्तर: गूँगा लड़का इशारों, आँखों के भावों और अजीब-सी आवाज़ों के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करता था। वह बहुत ही प्रतिभाशाली था और संकेतों के ज़रिए गहरी बातें कह जाता था।
प्रश्न 2: सुशीला के व्यवहार में गूँगे के प्रति बदलाव क्यों आया? उत्तर: शुरुआत में सुशीला के मन में गूँगे के प्रति दया थी, लेकिन धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि गूँगा ढीठ और ज़िद्दी है। जब उसे महसूस हुआ कि गूँगा उसके नियंत्रण से बाहर हो रहा है, तो उसका व्यवहार कठोर हो गया।
प्रश्न 3: कहानी के अंत में गूँगे की आँखों में आंसू क्यों थे? उत्तर: जब गूँगे को बेदर्दी से पीटा गया और उसे अहसास हुआ कि इस दुनिया में उसे कोई समझने वाला या प्यार करने वाला नहीं है, तो उसकी आँखों से उसके अकेलेपन और अपमान का दर्द आंसुओं के रूप में छलक पड़ा।