कवि पद्माकर रीति काल के श्रृंगारिक कवियों में प्रमुख स्थान रखते हैं। उनके पदों में प्रकृति का मानवीकरण बहुत ही सुंदर ढंग से किया गया है। आपके पाठ्यक्रम में तीन कवित्त संकलित हैं, जो वसंत, होली और वर्षा ऋतु के उल्लास को दर्शाते हैं।
"पद्माकर की कविता में अनुप्रास अलंकार की ऐसी छटा बिखरी है कि पढ़ते समय शब्दों का संगीत कानों में गूंजने लगता है।"
2. पदों का भावार्थ
वसंत वर्णन (औरै भांति कुंजन में): वसंत के आते ही कुंजों में भौरों की गूँज बदल गई है। बागों में पक्षियों का स्वर और फूलों की रंगत निराली हो गई है। यहाँ तक कि गलियों में घूमने वाले लोग और स्वयं ऋतुराज वसंत का स्वरूप भी पहले से 'और' (अलग) ही दिख रहा है।
होली वर्णन (गोकुल के कुल के गली के गोप): होली के त्योहार का उमंग इतना है कि गोपियाँ समाज की मर्यादा और डर को भूल गई हैं। कोई किसी की बात नहीं सुन रहा है, सब कृष्ण के रंग में रंगे हैं। एक गोपी कहती है कि उसने कृष्ण के रंग को निचोड़ने के बजाय उसे अपने हृदय में ही बसा लिया है।
वर्षा ऋतु (सावन की झड़ी): सावन के महीने में प्रकृति चारों ओर से प्रेम और आनंद की झड़ी लगा रही है। झूलों का झूलना, सखियों का संग और सावन की रिमझिम मन को सुख देने वाली है।
3. काव्यगत विशेषताएँ
भाषा: ब्रजभाषा का अत्यंत सजीव और सरस प्रयोग।
अलंकार: अनुप्रास अलंकार का चमत्कारिक प्रयोग (जैसे- 'कुंजन में गुंजरत')।
चित्रोपमता: पद्माकर के पद पढ़ते समय आँखों के सामने दृश्य सा खिंच जाता है।
4. महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1: वसंत आने पर प्रकृति में क्या-क्या परिवर्तन दिखाई देते हैं? उत्तर: वसंत आने पर भौरों की गुंजार, पक्षियों की चहचहाहट और फूलों के रंग और खुशबू पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं। पद्माकर के अनुसार, पूरी प्रकृति का स्वरूप ही बदल जाता है।
प्रश्न 2: होली वाले पद में 'तौऊ न बिछोरत' से क्या आशय है? उत्तर: इसका आशय है कि गोपी अपने ऊपर पड़े कृष्ण के प्रेम रूपी रंग को छुड़ाना नहीं चाहती। वह समाज के डर से उसे धोती नहीं है, बल्कि उस रंग को अपने भीतर और गहरा बसा लेना चाहती है।
प्रश्न 3: पद्माकर के काव्य की सबसे बड़ी शक्ति क्या है? उत्तर: पद्माकर के काव्य की सबसे बड़ी शक्ति उनकी भाषा की प्रवाहपूर्णता और शब्दों द्वारा बिंब (चित्र) खींचने की क्षमता है। वे प्रकृति के साथ मानवीय भावनाओं को खूबसूरती से जोड़ देते हैं।