काव्य खंड - पाठ 5: सुमित्रानंदन पंत (संध्या के बाद)

प्रस्तुतकर्ता: सोलंकी सर डिजिटल एकेडमी

1. पाठ का परिचय

सुमित्रानंदन पंत को 'प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है। 'संध्या के बाद' कविता उनके प्रगतिवादी दौर की रचना है। इसमें कवि ने केवल प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन नहीं किया है, बल्कि गाँव की गरीबी, लाचारी और वहाँ के निवासियों के ठहरे हुए जीवन का यथार्थ चित्रण भी किया है।

"कविता संध्या के समय गंगा के किनारे के बदलते रंगों से शुरू होकर ग्रामीण बाज़ार की उदासी और मज़दूरों के खालीपन तक पहुँचती है।"

2. कविता का सारांश

3. काव्य सौंदर्य

4. महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1: गंगा के किनारे की रेत को कवि ने 'स्वर्ण की सँपली' क्यों कहा है?
उत्तर: शाम के समय जब डूबते सूरज की पीली किरणें गंगा के किनारे की लहराती रेत पर पड़ती हैं, तो वह चमकती हुई रेत टेढ़ी-मेढ़ी सुनहरी सांपों की तरह दिखाई देती है।
प्रश्न 2: संध्या के समय ग्रामीण बाज़ार का वातावरण कैसा होता है?
उत्तर: संध्या के समय ग्रामीण बाज़ार में एक अजीब सी उदासी छा जाती है। दुकानदार ढिबरी (दीये) जलाते हैं, लेकिन उनकी रोशनी कम और धुंआ ज़्यादा होता है, जो उनके अभावग्रस्त और कठिन जीवन का प्रतीक है।
प्रश्न 3: पंत जी ने कविता के अंत में किस सामाजिक समस्या की ओर संकेत किया है?
उत्तर: कवि ने ग्रामीण गरीबी और वर्ग-भेद की समस्या की ओर संकेत किया है। वे चाहते हैं कि समाज में समानता आए और गाँव के गरीब लोगों को भी गरिमापूर्ण जीवन मिले।